“ वजूद ”
मन...
वेदनाओ के
अथाह सागर की गहराइयो में
डूबता – उतराता...
अपनी छोटी सी आशा की नौका के संग...
है उसे विश्वास
होंगे उसके सपने भी साकार ...
कभी ना कभी...
कभी ना कभी मिलेगा
उसे भी किनारा...
एक ऐसा किनारा
जहाँ उसका भी होगा
पूर्ण अस्तित्व...
स्वतंत्र होगी
उसकी भी इच्छा ....
पूर्ण होगी
हर आकांछा....
संवेदनाओ के लहरों पर सवार
प्रतीक्षा है .....
अतीत के कुहासो के छटने की
ढूंढ रही है
खुद अपने ही “ वजूद ” को
जिससे फिर ना कोई
कह सके
उसे “ नारी “
अबला सी....
अदना सी .......
..........अन्नपूर्णा गुप्ता .......
Nice writing !
ReplyDeleteThanks for your appreciation
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