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Showing posts from March, 2018

क्षणिकाएँ

अन्नपूर्णा गुप्ता तुम्हारे आँखों में अपना रूप देखती हूँ वरना आईने में तो तुम ही नज़र आते हो

तसव्वर

अन्नपूर्णा गुप्ता 03/09/2012 बेवफ़ा तेरे तसव्वर में वक़्त गुजरा कुछ इस कदर... दिये बुझ गये आंख जलती रही रात भर......

दिल की बातें

15-06-2017 अन्नपूर्णा गुप्ता             दिल की बातें .... दिल की बातें दिल ही जाने हमने तो लाख जतन किये पर ये है की कुछ भी ना माने ...... रिमझिम बूँदो  को तेरा पैग़ाम कहता है सर्द हवाओं को तेरा सलाम कहता है..... मौसम की रुमानीयत तेरी मुस्कुराहट और सुहानी शाम को तेरा श्रृंगार कहता है..... रंग बिरंगे फूलों के साथ घंटो वक़्त गुजारकर तुम्हारी भीनी खुशबू का अहसास करता है पर..... आज तो हैरान रह गयी मैं जब तुम सामने आये तुम्हे देख तुमसे मिल तुम्हारी आँखों मे झांककर जाने कैसे.... अजनबियों सी बात करता है.... पहचानने से इनकार करता है....

सपने

सपने..... यूँ ही दबा रखे थे जो सपने अरमानों के जमीं पर आज लहलहा उठे है हकीकत की बारिश के साथ..... .         ...अन्नपूर्णा गुप्ता .....

बारिश

अन्नपूर्णा गुप्ता 08/09/17             बारिश.... यादो के बारिश में जी भर के भीगी हूँ आज वक्त की छतरी को उड़ा ले गई कही अतीत की आंधी.... और साथ ले कर आयी रिमझिम स्मृतियों की फुहार... सारी की सारी बूँदों को महसूस करना चाहती थी मैं खुद में नही चाहती थी गिरे एक बूंद भी जमी पर... कुछ बूंदे गिरी आंखों में पुरानी खिलखिलाहटो के साथ तो कुछ गालो पर गीले बादलो  जैसे जो कोमलता से सहलाते रहे मेरे गालो को और भारी होते गये...... कुछ ने मन को गुदगुदाया ठंडी हवाओं की तरंगों के साथ उड़ते दुपट्टे जैसे मन बहकता रहा ..... इधर उधर छप छाप करती कुछ को अंजुलि में इकट्ठा कर आनन्दित होती रही उनकी शीतलता से.. तो कुछ को जोर लगा के एक बार फिर उछाल दिया अपने से दूर आसमान की तरफ... जाने कितना समय गुजार दिया  लम्हो की गर्माहट को लपेटे... कुछ उनींदी सी रही शाम  की प्याली में मेरे होठों से लगी चाय की चुस्कियां.....

दूपट्टा

                        अन्नपूर्णा गुप्ता 07/01/17                         दूपट्टा... कुछ ठिठकती झिझकती सी .... पिन के सहारे मोड कर कंधो पर करीने से लगाये दूपट्टे को एक बार फिर सही करती ....... जमे कदमो को धीरे धीरे ज़मीन से अलग करती माथे पे छलक आये पसीने की बूँदो को हथेलियो से झूठलाती ...... बार बार दाये बाये नजरो को घुमाती काश कोई और दिख जाये तो साझा हो जाये ....... कालेज के गेट पर खडे घूरती आँखो की जलन का जो तार तार कर देती है कंधो पर पिन के सहारे मोड कर करीने से लगाये दूपट्टे को ..........

एक कोना...

3rd June 2013 Annapurna Gupta                      एक कोना.... रोक लेती हूँ हरबार अपने कदमो को बढ़ जाने से पार कर जाने से दहलीज को...... जाने कितनी ही बेड़ियाँ बिखरी पड़ी है दहलीज के इस पार..... जकड़ लेती हूँ अपने कदमो को उन बेड़ियो से खुदबखुद संस्कारो का नाम दे कर..... तोड़ देती हूँ अपने ही हाथों से अपने सपनो का घरौंदा यथार्थ के आशियाने के नाम पर..... हर किसी की उम्मीदों की सजीवता में लग जाती हूँ अपनी उम्मीदों की बलि दे कर फिर उठती हूँ समेट कर अपने अरमानो के टुकड़ों को और छिपा जाती हूँ उन्हें कर्तव्यों के नाम पर...... पता नहीं कब ला पाऊंगी वो हिम्मत जो तोड़ कर रख देंगी उन बेड़ियों को..... जाने कब मैं करुँगी स्वागत अपने छोटे से घरौंदे में अपनी जिंदगी का ...... अपने अरमानो के लिये भी जिसमे होगा एक कोना... सबकी उम्मीदों को झाड़पोछ कर यथा संभव सहेज कर उन्हें उनके स्थान पर.... गुजार सकूँगी कुछ वक्त अपने सपनो के साथ मुस्कुराकर.......

माँ

          माँ माँ तुम हो शमा .... खुद जल कर करती हो रोशन हमारा जहाँ.....  हर इम्तिहान में  मैं रातो को जागती थी पर तुम भी कहाँ सो पाती थी कभी दूध का गिलास तो कभी कॉफ़ी की मिठास और उठ जाती थी मुझ से भी पहले बाकी है तेरी हथेलियों की गरमाहट मेरे माथे पर और बालो में घुमती तेरे उंगलियों के अहसास मेरे कपड़ो को ढूंढ़ ढूंढ़ कर तेरा संभालना मुझे जिसकी जरूरत हो मुझसे भी पहले समझ जाना मेरे हर कदम पर मुस्कुराकर अपना आँचल बिछाना लडखडाने पर झट से अपने हांथो से थाम लेना मुझसे दूर होने की बातों पर तेरी आँखों में पानी आना मेरी आने की खबर पर तेरा खिड़की पर बार बार आना तुझमे पाया है मैंने माँ स्नेह का आसमां माँ तुम हो शमा जो खुद जलकर करती हो रोशन हमारा जहाँ माँ प्यारी माँ Happy mother's day ......अन्नपूर्णा गुप्ता ....

प्यार की कहानी

अन्नपूर्णा गुप्ता 02/11/2017                                       प्यार की कहानी सूख गयी थी.... वक्त के रेगिस्तानों में कहीं जाने कैसे तेरी यादें... आज तरल हो गयी.... बादल की तरह छा गयी हृदय में एकाएक मानो सावन आ गया और ये आँखे ... अचानक कुछ सजल हो गयी.... जाने कितने ही ख़तों को सहेजा हर बार उनकी राख से हथेलियां रंगती गयी.... मैं नही चाहती थी तुम कहो कि ... मेरी तरफ से पहल हो गयी..... खामोशियों के पन्नो पे छिपी प्यार की कहानी तुम कभी पढ़ ही नही पाए और मैं .... लिखती चली गयी.... सचमुच मेरी जिंदगी एक अनछुई... प्यारी सी ग़ज़ल हो गयी......

सुबह

                         सुबह आज की सुबह कितनी सुहानी है... चाय के प्यालो के साथ जब मैं तुम्हारे चेहरे से हटाती हूँ अख़बार हर बार तुम यही कहते हो... और फिर वह मुस्कुराहट जो मेरे चेहरे पर आती है तुम कहते हो अहा ! कितना सुंदर फूल खिला है मेरे हाथों को अपने हाथों में थामकर मुझे यकीन दिलाते हुये लम्बी सांसो के साथ हवा को महसूस कर कहना देखो तभी तो हवा इतनी सुगन्धित है..... मेरे गीले बालों से टपकती नन्ही बूँदों को अपनी उँगली के पोरों पे टिका आसमान की तरफ सर उठा कर कहना लगता है बारिश का अंदेशा है . . फिर खिलखिलाहटों का दौर् चाय की चुस्कियाँ और प्रेम में पके अल्पाहार... तुम्हारे हाथों में जादू है तुम सच मे अन्नपूर्णा हो बस अब दिन अच्छा गुजरेगा.... तुम जो हो..... कुछ ऐसी  ही हर रोज की कहानी हैं माना थोड़ी रूमानी है पर सुबह बहुत सुहानी है हम दोनों की..... ......अन्नपूर्णा गुप्ता ......
तन्हाइयो की चादर उतार रख दी मैंने..... अच्छी लग रही है जिन्दगी की गुदगुदाहट ........ अन्नपूर्णा गुप्ता

स्पर्श

            “स्पर्श “ ऐ हवाओं ! क्या तुमने कही देखा है उस फूल को जिसे मैं देखा करती थी हर रोज खिड़की से उगते सूरज के बहाने ..... क्या तुमने कही महसूस किया है उसकी उस भीनी सुगंध को जिसे मैं महसूस करती थी अपनी साँसो के बहाने ....... अजीब सी कशिश थी उसके रूप मे देखते ही अधरो पर मुस्कान आती थी न जाने कौन सी मोहिनी थी उसमे निगाहे वही खिची चली जाती थी उसके पंखुड़ियों पे पड़ी मोती को माथे से लगाती थी श्रिंगार के बहाने ........ ऐ बहारों क्या तुमने कही देखा है उस फूल को जो तेरे आने के पहले ही खिल जाता था और जब तुम अपना रंग बिखेरती तो, वह और भी निखर जाता था ......... मैंने उसे कभी मंदिर में नहीं सजाया क्योकि ..... मुझे डर था उसके खो जाने का शायद मेरे इसी स्वार्थ ने उसे मुझसे अलग कर दिया वो जाने कहा चला गया ..... ऐ धूप ! ऐ धूप ! अगर वो तुझे कही मिले तो जरूर आना जरूर आना मेरी उस खिड़की पर मैं उसे स्पर्श कर लूँगी तुझे छूने के बहाने .......... .......अन्नपूर्णा गुप्ता .......
जाने कब हम ओंस बन पत्ते से फिसल गये पता ही नही चला... कब मचलती बूँद में बदल गए पता ही नही चला.... हमने तो सोचा हम सीप में गिर मोती बनेंगे कब रेत में मिल गये पता ही नही चला.... अन्नपूर्णा गुप्ता

वजूद

“ वजूद ” मन... वेदनाओ के अथाह सागर की गहराइयो में डूबता – उतराता... अपनी छोटी सी आशा की नौका के संग... है उसे विश्वास होंगे उसके सपने भी साकार ... कभी ना कभी... कभी ना कभी मिलेगा उसे भी किनारा... एक ऐसा किनारा जहाँ उसका भी होगा पूर्ण अस्तित्व... स्वतंत्र होगी उसकी भी इच्छा .... पूर्ण होगी हर आकांछा.... संवेदनाओ के लहरों पर सवार प्रतीक्षा है ..... अतीत के कुहासो के छटने की ढूंढ रही है खुद अपने ही “ वजूद ” को जिससे फिर ना कोई कह सके उसे “ नारी “ अबला सी.... अदना सी ....... ..........अन्नपूर्णा गुप्ता .......

मैंने देखा है

मैंने देखा है  सपनो को सड़ते गलते हसरतों की ज़मी में दबते खाद बन दूसरे पौधों को सींचते उन्हें उम्मीदों के साथ पेड़ बनाते उन पेड़ो का उस सपने पे झुंझलाते उनका मज़ाक बनाते ...अन्नपूर्णा गुप्ता