“स्पर्श “ ऐ हवाओं ! क्या तुमने कही देखा है उस फूल को जिसे मैं देखा करती थी हर रोज खिड़की से उगते सूरज के बहाने ..... क्या तुमने कही महसूस किया है उसकी उस भीनी सुगंध को जिसे मैं महसूस करती थी अपनी साँसो के बहाने ....... अजीब सी कशिश थी उसके रूप मे देखते ही अधरो पर मुस्कान आती थी न जाने कौन सी मोहिनी थी उसमे निगाहे वही खिची चली जाती थी उसके पंखुड़ियों पे पड़ी मोती को माथे से लगाती थी श्रिंगार के बहाने ........ ऐ बहारों क्या तुमने कही देखा है उस फूल को जो तेरे आने के पहले ही खिल जाता था और जब तुम अपना रंग बिखेरती तो, वह और भी निखर जाता था ......... मैंने उसे कभी मंदिर में नहीं सजाया क्योकि ..... मुझे डर था उसके खो जाने का शायद मेरे इसी स्वार्थ ने उसे मुझसे अलग कर दिया वो जाने कहा चला गया ..... ऐ धूप ! ऐ धूप ! अगर वो तुझे कही मिले तो जरूर आना जरूर आना मेरी उस खिड़की पर मैं उसे स्पर्श कर लूँगी तुझे छूने के बहाने .......... .......अन्नपूर्णा गुप्ता .......