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क्षणिकाएँ

अन्नपूर्णा गुप्ता तुम्हारे आँखों में अपना रूप देखती हूँ वरना आईने में तो तुम ही नज़र आते हो
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तसव्वर

अन्नपूर्णा गुप्ता 03/09/2012 बेवफ़ा तेरे तसव्वर में वक़्त गुजरा कुछ इस कदर... दिये बुझ गये आंख जलती रही रात भर......

दिल की बातें

15-06-2017 अन्नपूर्णा गुप्ता             दिल की बातें .... दिल की बातें दिल ही जाने हमने तो लाख जतन किये पर ये है की कुछ भी ना माने ...... रिमझिम बूँदो  को तेरा पैग़ाम कहता है सर्द हवाओं को तेरा सलाम कहता है..... मौसम की रुमानीयत तेरी मुस्कुराहट और सुहानी शाम को तेरा श्रृंगार कहता है..... रंग बिरंगे फूलों के साथ घंटो वक़्त गुजारकर तुम्हारी भीनी खुशबू का अहसास करता है पर..... आज तो हैरान रह गयी मैं जब तुम सामने आये तुम्हे देख तुमसे मिल तुम्हारी आँखों मे झांककर जाने कैसे.... अजनबियों सी बात करता है.... पहचानने से इनकार करता है....

सपने

सपने..... यूँ ही दबा रखे थे जो सपने अरमानों के जमीं पर आज लहलहा उठे है हकीकत की बारिश के साथ..... .         ...अन्नपूर्णा गुप्ता .....

बारिश

अन्नपूर्णा गुप्ता 08/09/17             बारिश.... यादो के बारिश में जी भर के भीगी हूँ आज वक्त की छतरी को उड़ा ले गई कही अतीत की आंधी.... और साथ ले कर आयी रिमझिम स्मृतियों की फुहार... सारी की सारी बूँदों को महसूस करना चाहती थी मैं खुद में नही चाहती थी गिरे एक बूंद भी जमी पर... कुछ बूंदे गिरी आंखों में पुरानी खिलखिलाहटो के साथ तो कुछ गालो पर गीले बादलो  जैसे जो कोमलता से सहलाते रहे मेरे गालो को और भारी होते गये...... कुछ ने मन को गुदगुदाया ठंडी हवाओं की तरंगों के साथ उड़ते दुपट्टे जैसे मन बहकता रहा ..... इधर उधर छप छाप करती कुछ को अंजुलि में इकट्ठा कर आनन्दित होती रही उनकी शीतलता से.. तो कुछ को जोर लगा के एक बार फिर उछाल दिया अपने से दूर आसमान की तरफ... जाने कितना समय गुजार दिया  लम्हो की गर्माहट को लपेटे... कुछ उनींदी सी रही शाम  की प्याली में मेरे होठों से लगी चाय की चुस्कियां.....

दूपट्टा

                        अन्नपूर्णा गुप्ता 07/01/17                         दूपट्टा... कुछ ठिठकती झिझकती सी .... पिन के सहारे मोड कर कंधो पर करीने से लगाये दूपट्टे को एक बार फिर सही करती ....... जमे कदमो को धीरे धीरे ज़मीन से अलग करती माथे पे छलक आये पसीने की बूँदो को हथेलियो से झूठलाती ...... बार बार दाये बाये नजरो को घुमाती काश कोई और दिख जाये तो साझा हो जाये ....... कालेज के गेट पर खडे घूरती आँखो की जलन का जो तार तार कर देती है कंधो पर पिन के सहारे मोड कर करीने से लगाये दूपट्टे को ..........

एक कोना...

3rd June 2013 Annapurna Gupta                      एक कोना.... रोक लेती हूँ हरबार अपने कदमो को बढ़ जाने से पार कर जाने से दहलीज को...... जाने कितनी ही बेड़ियाँ बिखरी पड़ी है दहलीज के इस पार..... जकड़ लेती हूँ अपने कदमो को उन बेड़ियो से खुदबखुद संस्कारो का नाम दे कर..... तोड़ देती हूँ अपने ही हाथों से अपने सपनो का घरौंदा यथार्थ के आशियाने के नाम पर..... हर किसी की उम्मीदों की सजीवता में लग जाती हूँ अपनी उम्मीदों की बलि दे कर फिर उठती हूँ समेट कर अपने अरमानो के टुकड़ों को और छिपा जाती हूँ उन्हें कर्तव्यों के नाम पर...... पता नहीं कब ला पाऊंगी वो हिम्मत जो तोड़ कर रख देंगी उन बेड़ियों को..... जाने कब मैं करुँगी स्वागत अपने छोटे से घरौंदे में अपनी जिंदगी का ...... अपने अरमानो के लिये भी जिसमे होगा एक कोना... सबकी उम्मीदों को झाड़पोछ कर यथा संभव सहेज कर उन्हें उनके स्थान पर.... गुजार सकूँगी कुछ वक्त अपने सपनो के साथ मुस्कुराकर.......