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एक कोना...





3rd June 2013
Annapurna Gupta

                     एक कोना....


रोक लेती हूँ हरबार
अपने कदमो को
बढ़ जाने से
पार कर जाने से
दहलीज को......
जाने कितनी ही बेड़ियाँ
बिखरी पड़ी है
दहलीज के इस पार.....
जकड़ लेती हूँ अपने कदमो को
उन बेड़ियो से
खुदबखुद
संस्कारो का नाम दे कर.....
तोड़ देती हूँ
अपने ही हाथों से
अपने सपनो का घरौंदा
यथार्थ के आशियाने के नाम पर.....
हर किसी की उम्मीदों की
सजीवता में लग जाती हूँ
अपनी उम्मीदों की बलि दे कर
फिर उठती हूँ
समेट कर अपने
अरमानो के टुकड़ों को
और
छिपा जाती हूँ उन्हें
कर्तव्यों के नाम पर......
पता नहीं कब
ला पाऊंगी
वो हिम्मत
जो तोड़ कर रख देंगी
उन बेड़ियों को.....
जाने कब
मैं करुँगी
स्वागत
अपने छोटे से घरौंदे में
अपनी जिंदगी का ......
अपने अरमानो के लिये भी
जिसमे होगा एक कोना...
सबकी उम्मीदों को
झाड़पोछ कर
यथा संभव सहेज कर
उन्हें उनके स्थान पर....
गुजार सकूँगी
कुछ वक्त
अपने सपनो के साथ
मुस्कुराकर.......

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