Skip to main content

क्षणिकाएँ

अन्नपूर्णा गुप्ता


तुम्हारे आँखों में अपना रूप देखती हूँ
वरना आईने में तो तुम ही नज़र आते हो

Comments

Popular posts from this blog

मैंने देखा है

मैंने देखा है  सपनो को सड़ते गलते हसरतों की ज़मी में दबते खाद बन दूसरे पौधों को सींचते उन्हें उम्मीदों के साथ पेड़ बनाते उन पेड़ो का उस सपने पे झुंझलाते उनका मज़ाक बनाते ...अन्नपूर्णा गुप्ता

दूपट्टा

                        अन्नपूर्णा गुप्ता 07/01/17                         दूपट्टा... कुछ ठिठकती झिझकती सी .... पिन के सहारे मोड कर कंधो पर करीने से लगाये दूपट्टे को एक बार फिर सही करती ....... जमे कदमो को धीरे धीरे ज़मीन से अलग करती माथे पे छलक आये पसीने की बूँदो को हथेलियो से झूठलाती ...... बार बार दाये बाये नजरो को घुमाती काश कोई और दिख जाये तो साझा हो जाये ....... कालेज के गेट पर खडे घूरती आँखो की जलन का जो तार तार कर देती है कंधो पर पिन के सहारे मोड कर करीने से लगाये दूपट्टे को ..........