अन्नपूर्णा गुप्ता
08/09/17
बारिश....
यादो के बारिश में
जी भर के भीगी हूँ आज
वक्त की छतरी को
उड़ा ले गई कही
अतीत की आंधी....
और साथ ले कर आयी
रिमझिम स्मृतियों की फुहार...
सारी की सारी बूँदों को
महसूस करना चाहती थी
मैं खुद में
नही चाहती थी गिरे
एक बूंद भी
जमी पर...
कुछ बूंदे गिरी आंखों में
पुरानी खिलखिलाहटो के साथ
तो कुछ गालो पर
गीले बादलो जैसे
जो कोमलता से सहलाते रहे
मेरे गालो को
और भारी होते गये......
कुछ ने मन को गुदगुदाया
ठंडी हवाओं की तरंगों के साथ
उड़ते दुपट्टे जैसे
मन बहकता रहा .....
इधर उधर छप छाप करती
कुछ को
अंजुलि में इकट्ठा कर
आनन्दित होती रही
उनकी शीतलता से..
तो कुछ को
जोर लगा के एक बार फिर
उछाल दिया
अपने से दूर
आसमान की तरफ...
जाने कितना समय गुजार दिया
लम्हो की गर्माहट को लपेटे...
कुछ उनींदी सी रही
शाम की प्याली में
मेरे होठों से लगी
चाय की चुस्कियां.....
08/09/17
बारिश....
यादो के बारिश में
जी भर के भीगी हूँ आज
वक्त की छतरी को
उड़ा ले गई कही
अतीत की आंधी....
और साथ ले कर आयी
रिमझिम स्मृतियों की फुहार...
सारी की सारी बूँदों को
महसूस करना चाहती थी
मैं खुद में
नही चाहती थी गिरे
एक बूंद भी
जमी पर...
कुछ बूंदे गिरी आंखों में
पुरानी खिलखिलाहटो के साथ
तो कुछ गालो पर
गीले बादलो जैसे
जो कोमलता से सहलाते रहे
मेरे गालो को
और भारी होते गये......
कुछ ने मन को गुदगुदाया
ठंडी हवाओं की तरंगों के साथ
उड़ते दुपट्टे जैसे
मन बहकता रहा .....
इधर उधर छप छाप करती
कुछ को
अंजुलि में इकट्ठा कर
आनन्दित होती रही
उनकी शीतलता से..
तो कुछ को
जोर लगा के एक बार फिर
उछाल दिया
अपने से दूर
आसमान की तरफ...
जाने कितना समय गुजार दिया
लम्हो की गर्माहट को लपेटे...
कुछ उनींदी सी रही
शाम की प्याली में
मेरे होठों से लगी
चाय की चुस्कियां.....
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