जाने कब हम ओंस बन
पत्ते से फिसल गये
पता ही नही चला...
कब मचलती बूँद में
बदल गए
पता ही नही चला....
हमने तो सोचा
हम सीप में गिर मोती बनेंगे
कब रेत में मिल गये
पता ही नही चला....
मैंने देखा है सपनो को सड़ते गलते हसरतों की ज़मी में दबते खाद बन दूसरे पौधों को सींचते उन्हें उम्मीदों के साथ पेड़ बनाते उन पेड़ो का उस सपने पे झुंझलाते उनका मज़ाक बनाते ...अन्नपूर्णा गुप्ता
अन्नपूर्णा गुप्ता 07/01/17 दूपट्टा... कुछ ठिठकती झिझकती सी .... पिन के सहारे मोड कर कंधो पर करीने से लगाये दूपट्टे को एक बार फिर सही करती ....... जमे कदमो को धीरे धीरे ज़मीन से अलग करती माथे पे छलक आये पसीने की बूँदो को हथेलियो से झूठलाती ...... बार बार दाये बाये नजरो को घुमाती काश कोई और दिख जाये तो साझा हो जाये ....... कालेज के गेट पर खडे घूरती आँखो की जलन का जो तार तार कर देती है कंधो पर पिन के सहारे मोड कर करीने से लगाये दूपट्टे को ..........
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